मैं मानसिक रूप से स्थिर व्यक्ति हूँ: जस्टिस कर्णन

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www.livelaw.in से साभार 

Interview of Justice Karnan by Rabi Banerjee of The Week.

Hindi Translation: Sudhir Ambedkar

जस्टिस चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन का सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ विवाद भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अभूतपूर्व है. कर्णन केस सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय संविधान का बलात्कार है. जस्टिस कर्णन ऐसे पहले पहले न्यायाधीश हैं जिन्हें पद पर रहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह माह की सजा भी सुना दी है.  The Week नामक वेब मैगज़ीन के Rabi Banerjee ने जस्टिस कर्णन का साक्षात्कार किया. इस साक्षात्कार में जस्टिस कर्णन ने खुलकर अपना पक्ष रखा. इस साक्षात्कार का ही अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है. मूल अंग्रेजी संस्करण पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

जजों में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार के बारे में आपने प्रधानमन्त्री जी को क्यों लिखा?

भारतीय संविधान के अनुसार, न्यायपालिका एक शीर्ष संस्था है. केंद्र एवं राज्य सरकारें, विधानसभाएँ, संसद, नौकरशाह, राजनेता अथवा सामान्य जनता न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकते. इसीलिये न्यायपालिका एक स्वायत्त संस्था के रूप में कार्य कर पा रही है. फिर भी, (जो गलत हो रहा है, उसके प्रति) कहीं कोई सुधार नही है, और न ही उसका (गलत का) कहीं कोई विरोध हो रहा है.

लेकिन आपने प्रधानमंत्री जी को (पत्र) क्यों लिखा?

सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के बीस जजों के खिलाफ प्रधानमंत्री से मैंने शिकायत की. मैंने यह आरोप लगाया है कि बीस जज भ्रष्ट हैं. मैंने माननीय प्रधानमंत्री जी से सीबीआई, राजस्व ख़ुफ़िया सेवा, प्रवर्तन विभाग, और नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी में से प्रत्येक से एक-एक शीर्ष अधिकारी की सहायता लेकर एक व्यापक जाँच कराने का अनुरोध किया. मैंने (उस पत्र में ) उन दस गवाहों का भी जिक्र किया जो अवैध लेन-देन के कार्य में भ्रष्ट जजों के बिचौलिये और दलाल के रूप में कार्य करते हैं. उन्होंने (जजों ने) अपनी न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों का दुरूपयोग किया.

वे कौन लोग हैं?

मुख्य गवाहों में एक मिस्टर बी. हरि हैं जो मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के निजी सचिव हैं और दूसरे, मिस्टर आर. कन्नपन जो कि मद्रास हाई कोर्ट के निबंधक-सह-प्रशासक( Registrar-cum-Administrator) हैं. कन्नपन को मद्रास उच्चन्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने दोहरी पदोन्नति प्रदान की थी क्योंकि वह (भ्रष्टाचार) की गोपनीयता बनाये रखे थे और अवैध लेन-देन के मामले में बहुत ही भरोसेमंद थे. दोनों गवाहों से उपर्युक्त शीर्ष अधिकारियों द्वारा पूछ-ताछ की जानी चाहिए. गबन के सभी दोषियों पर ‘थर्ड डिग्री’ लगायी जानी चाहिए.

थर्ड डिग्री? क्या यह कानून द्वारा मान्य है ?

कानून थर्ड डिग्री पद्धति की अनुमति नही देता. लेकिन इस मामले में, दस लाख करोड़ रूपए  वसूलने के लिए यह जरुरी है.

पैसा कहाँ है?

यह (भ्रष्टाचार अर्जित धन) केवल भारत में ही नही लगाया गया है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय ‘हवाला’ सिस्टम के जरिये इसका निवेश विदेशों में भी किया गया है. परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के इन सात जजों ने खुद सहित इन बीस भ्रष्ट जजों को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेते हुए मेरे खिलाफ अवमानना का मामला बना दिया जोकि पूरी तरह से गैर-कानूनी है और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

आपने अपनी शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष क्यों नही दर्ज कराई?           

सुप्रीम कोर्ट के वार्तमान न्यायधीशों पर से मेरा विश्वास उठ चुका है. 08 फरवरी का मेरी प्रशासनिक शक्तियों को छीनने वाला सात जजों का आदेश विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन है और विवेकहीनता का परिचायक है. इसका (आदेश का) क्रियान्वयन नही किया जासकता. मुझे परेशान करने के लिए ये सात जज लगातार गलत आदेश पारित करते रहे. यहाँ तक कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को अपने आदेश के अनुपालन हेतु दो बार मेरे पास भेजा. उन्होंने मेरी मानसिक स्थिरता की जांच हेतु चिकित्सकीय जाँच का आदेश भी दिया. मेरी और इन सात जजों की मानसिक स्थिरता की जाँच करने के लिए, उनके और मेरे द्वारा पारित किये गए न्यायिक आदेशों की जाँच की जानी चाहिए. उसके बाद पता चल जाएगा कि चिकित्सकीय उपचार की जरुरत किसको है.

इन सात न्यायधीशों ने आपका विरोध क्यों किया?’

उनके अपने हित होंगे. इसीलिये उन्होंने मेरी शिकायत को ख़ारिज करने के लिए यह शोर्ट-कट तरीका अख्त्यार किया.

आप पर महाभियोग का खतरा है.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों को यह मेरी चुनौती है कि वे मेरे केस को महाभियोग हेतु संसद में ले जाएँ. क़ानून-निर्माताओं (सांसदों) का सामना करने के लिए मैं तैयार हूँ. लेकिन मुझे पता है कि वे ऐसा नही करेंगे क्योंकि वे एक्सपोज हो जायेंगे.

क्या आपको महाभियोग का डर नही है?

मैं तो उसी का इंतज़ार कर रहा हूँ. मैंने भारत के तत्कालीन मुख्यन्यायाधीश एच.एल दत्तू से मुझे और संजय किशन कौल (मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के जज) जोकि मेरे अनुसार आरोपित जजों में से एक हैं, को संसद भेजने का अनुरोध किया था. यही अनुरोध मैंने जस्टिस टी.एस. ठाकुर से भी किया था किन्तु उनमे से किसी ने भी मेरी प्रार्थना को स्वीकार नही किया. तो मैं क्या कर सकता हूँ?

आप अपने आप को न्यायपालिका के भ्रष्टाचार तक ही क्यों सीमित रखते हैं?

एक वकील के रूप में अपनी प्रैक्टिस के दौरान मैंने न्यायिक अधिकारीयों के बीच बहुत सी  अनियमितताओं के बारे में जाना और इस सबसे मैं खुश नही था. एक न्यायाधीश के रूप में उत्तिष्ठित होने के बाद मैंने नोटिस किया कि मद्रास उच्च न्यायालय के अधिकांश जज अपराधियों से भी ज्यादा बुरे थे. मैं उनके द्वारा की जाने वाली अवैध गतिविधियों, भ्रष्टाचार, जालसाजी, कस्टोडियल रेप, और जातिगत भेदभाव से परेशान था.

क्या राजनीतिक प्रतिष्ठान (राजनीति) और न्यायपालिका के बीच कोई अंदरूनी गठजोड़ है?

मैं खुद को सिर्फ न्यायपालिका तक ही सीमित रखूँगा जहाँ मैंने 32 वर्ष तक काम किया है. 2011 से ही मैंने उच्च न्यायालय के जजों से लेकर डिस्ट्रिक्ट जजों, वरिष्ठ एवं कनिष्ठ डिवीज़नल जजों तक की नियुक्ति प्रक्रिया और प्रोन्नति को लेकर शिकायतें की हैं.

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए आपको कोई धमकियाँ मिली हैं?

चूँकि न्यायपालिका का वास्ता आम लोगों से है तो मैं उनके सामने इन अनियमितताओं का खुलासा कर रहा हूँ.  इसके अतिरिक्त, जजों की सुविधाएँ और भत्ते भी जनता के पैसे से ही दिए जाते हैं. मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता कि किसने क्या कहा. मुझे जजों की गुणवत्ता से लेना-देना नही है; लेकिन मुझे आम जनता के कल्याण की फिक्र है. इसलिए मैंने अपनी आवाज उठाई. मैं एक विस्सलब्लोअर हूँ. कोई व्यक्ति—चाहे वो आम जनता से हो, या विधायिका से हो, यदि वे न्यायधीशो के भ्रष्टाचार के बारे में खुलासा करते हैं तो उन्हें जेल भेज दिया जायेगा. लेकिन मेरे मामले में यह स्थिति नही बनती क्योंकि मैं एक संवैधानिक पद धारण किये हूँ. मेरी लड़ाई 11 जून, 2017 तक जारी रहेगी जिस दिन मैं सेवानिवृत्त हो रहा हूँ. उसके बाद मेरा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा क्योंकि फिर मेरे पास कोई हथियार नही होगा.

सेवानिवृत्ति के बाद, आप क्या करेंगे?

मैं तमिलनाडु में एक न्यायिक अकादमी की स्थापना करना चाहता हूँ. खराब अंग्रेजी के कारण गरीब लोग कुछ कर नही पाते हैं. मैं उन्हें प्रशिक्षण देकर अच्छा वकील और जज बनाना चाहता हूँ.

क्या आप की मुलाकात बीजेपी के किसी नेता से हुई है?

हालाँकि मैं एक हिन्दू हूँ, फिर भी दो महीने पहले मुस्लिम, क्रिस्चियन, मोस्ट बैकवर्ड और डिनोटिफाइड समुदाय के लोगों की विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्ति हेतु मैं सुप्रीम कोर्ट से मिला था. मैं धर्म, जाति, नस्ल और पंथ से मुक्त होकर सोचता हूँ. मेरे कार्यकाल के दौरान, वादियों को मैंने गुणवत्तायुक्त निर्णय बिना किसी पक्ष-पात के दिए हैं. किसी राजनीतिक दल से जुड़ने अथवा किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा लेने का मेरा कोई इरादा नही है. क्योंकि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपालों, राजदूतों, और सर्वोच्च व् उच्च न्यायालय के जजों को अपने कार्यकाल की समाप्ति पर राजनीति में नही जाना चाहिए. इसका उद्देश्य नैतिकता बनाए रखना है.

क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों पर आक्रमण उचित है?

उन्होंने गलत किया है. उन पर हमला करके मैं कुछ भी गलत नही कर रहा हूँ.

क्या सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के जज के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर सकता है?

नही, वे ऐसा नही कर सकते. उनका आदेश पूरी तरह से गलत है.

क्या आप सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ख़ारिज Overrule कर सकते हैं?

संविधान में, अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट को शक्तियां प्रदान की गयीं हैं. इसी तरह की शक्तियां उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्रदान की गयीं हैं. अतः इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ही बराबर हैं. यह एक संवैधानिक गतिरोध है. सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसा आदेश मेरे खिलाफ जारी नही कर सकते. यह अवैधानिक और अनैतिक है.

जब सुप्रीम कोर्ट ने आपकी मानसिक स्थिति की जाँच का आदेश दिया तो आपकी प्रतिक्रिया क्या रही?

मैं मानसिक रूप से स्थिर व्यक्ति हूँ. मैं बिलकुल भी हैरान नही था. मैं एक उच्चशिक्षित, सुसंस्कृत एवं सभ्य व्यक्ति हूँ. मैंने अपने जीवन में कई बुरी परिस्थितियों को देखा है. तो, यदि फिर से कोई अप्रिय एवं कठिन स्थिति पैदा हो जाती है तो मैं डरूंगा नही. मुझे सुप्रीम कोर्ट के जजों का विरोध करने में कोई डर नही.

आप पूरे सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ हैं या फिर मात्र कुछ जजों के?

मैं केवल सात जजों के खिलाफ हूँ. मैं सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करता हूँ.


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