A dalit girl Tina Dabi tops the UPSC civil services examination: A moment of glory for the community. In the entire history of UPSC, this is the for the first time that a person from the community has outperformed all other candidates in this highly competitive examination.

Good morning,

I would not be around when you read this letter. Don’t get angry on me. I know some of you truly cared for me, loved me and treated me very well. I have no complaints on anyone. It was always with myself I had problems. I feel a growing gap between my soul and my body. And I have become a monster. I always wanted to be a writer. A writer of science, like Carl Sagan. At last, this is the only letter I am getting to write.

I loved science, stars, nature, but then I loved people without knowing that people have long since divorced from nature. Our feelings are second handed. Our love is constructed. Our beliefs coloured. Our originality valid through artificial art. It has become truly difficult to love without getting hurt.

The value of a man was reduced to his immediate identity and nearest possibility. To a vote. To a number. To a thing. Never was a man treated as a mind. As a glorious thing made up of stardust. In very field, in studies, in streets, in politics, and in dying and living.

I am writing this kind of letter for the first time. My first time of a final letter. Forgive me if I fail to make sense.

May be I was wrong, all the while, in understanding world. In understanding love, pain, life, death. There was no urgency. But I always was rushing. Desperate to start a life. All the while, some people, for them, life itself is curse. My birth is my fatal accident. I can never recover from my childhood loneliness. The unappreciated child from my past.

I am not hurt at this moment. I am not sad. I am just empty. Unconcerned about myself. That’s pathetic. And that’s why I am doing this.

People may dub me as a coward. And selfish, or stupid once I am gone. I am not bothered about what I am called. I don’t believe in after-death stories, ghosts, or spirits. If there is anything at all I believe, I believe that I can travel to the stars. And know about the other worlds.

If you, who is reading this letter can do anything for me, I have to get seven months of my fellowship, one lakh and seventy five thousand rupees. Please see to it that my family is paid that. I have to give some 40 thousand to Ramji. He never asked them back. But please pay that to him from that.

Let my funeral be silent and smooth. Behave like I just appeared and gone. Do not shed tears for me. Know that I am happy dead than being alive.

“From shadows to the stars.”

Uma anna, sorry for using your room for this thing.

To ASA family, sorry for disappointing all of you. You loved me very much. I wish all the very best for the future.

For one last time,

Jai Bheem

I forgot to write the formalities. No one is responsible for my this act of killing myself.

No one has instigated me, whether by their acts or by their words to this act.

This is my decision and I am the only one responsible for this.

Do not trouble my friends and enemies on this after I am gone.

http://www.dailyo.in/politics/rohith-vemula-dalit-scholar-expelled-suicide-university-of-hyderabad-asa-occupy-ugc/story/1/8514.html

हमारे प्रमुख त्यौहार एवं तिथियाँ

संस्कृति  हमारे अवचेतन में संचित उन विश्वासों, मान्यताओं एवं परम्पराओं को कहते हैं जो हमारे सामान्य व्यवहार को निर्देशित करते हैं. इस प्रकार संस्कृति हमारे वयवहार की स्थायी नियामक है. विचार हमारी अस्थायी स्मृति का अंग होते हैं. हमारे विचार हमारे व्यवहार को तब तक प्रभावित नही करते जब तक कि हम उन्हें उनकी पूर्णता में स्वीकार न करें. किन्तु जब कोई विचार व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता हासिल कर लेता है तो वह मूल्य बन जाता है और चूँकि उसकी उपादेयता पर कोई प्रश्न नही उठता तो वह मनुष्य के अवचेतन में बैठकर संस्कार के रूप में स्थापित होजाता है. किसी संस्कृति को स्थापित और संचारित करने के कई उपकरणों में से एक हैं हमारे त्यौहार.

नीचे दीगई सूची अनंतिम और अपूर्ण है.नयी जानकारी मिलने पर blog पोस्ट को अपडेट किया जाएगा.

हमारे त्यौहार एवं महत्वपूर्ण तिथियाँ.

  1. 1 जनवरी, भीमा कोरेगांव  विजय दिवस
  2. 3 जनवरी, राष्ट्रीय शिक्षक दिवस, जयपाल सिंह मुंडा जयंती
  3. 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस
  4. 7 फरवरी, माता रमाबाई अम्बेडकर जयंती
  5. 19 फरवरी, छत्रपति शिवाजी महाराज
  6. 23 फरवरी, संत गाडगे जयंती
  7. 6 मार्च, कालाराम मंदिर सत्याग्रह दिवस
  8. 9 मार्च, संत तुकाराम स्मृति दिवस
  9. 10 मार्च, क्रान्तिज्योति सावित्रीबाई फुले स्मृति दिवस
  10. 15 मार्च, मान्यवर कांशीराम जयंती
  11. 20 मार्च, चवदार तालाब महाड़ सत्याग्रह
  12. 11 अप्रैल,महात्मा फुले जयंती.
  13. 14 अप्रैल , अम्बेडकर जयंती.
  14. 1 मई, अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस
  15. 26 जून, छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती
  16. 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस
  17. 17 सितम्बर, पेरियार जयंती
  18. 9 अक्टूबर, कांशीराम परिनिर्वाण दिवस
  19. 14 अक्टूबर, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस
  20. 15 नवम्बर, बिरसा मुंडा जयंती
  21. 26 नवम्बर, संविधान दिवस
  22. 28 नवम्बर, बिरसा मुंडा परिनिर्वाण दिवस
  23. 6 दिसम्बर, महापरिनिर्वाण दिवस.
  24. 20 दिसम्बर, गाडगे बाबा परिनिर्वाण दिवस
  25. 24 दिसम्बर, पेरियार परिनिर्वाण दिवस.

ज्ञान ज्योति सावित्रीबाई फुले

यह आलेख NCERT की 2008 की मेमोरियल लेक्चर सीरीज(स्मारक व्याख्यान श्रंखला में आयोजित सावित्रीबाई मेमोरियल लेक्चर का एक भाग है. इसके लेखक हैं प्रो हरि नारके. प्रो नारके महात्मा फुले पीठ, पुणे विश्वविद्यालय के निदेशक हैं. वे एक प्रख्यात विद्वान् हैं जो अब तक 6000 से अधिक व्याख्यान दुनिया के प्रसिद्द विश्वविद्यालयों में दे चुके हैं. पुणे में महात्मा फुले मेमोरियल, नैगाँव में सावित्रीबाई फुले का मेमोरियल और संसद भवन में महात्मा फुले की प्रतिमा स्थापित करने की पहल करने का श्रेय प्रो. नारके को ही जाता है.

अनुवादक के दो शब्द

राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले

माता सावित्रीबाई फुले का जीवन करुणा और त्याग से प्रज्वलित एक मशाल हैं. पहली बार जब इस लेख को इन्टरनेट पर मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि यह इतना महत्वपूर्ण है कि इसे हिंदी में अवश्य होना चाहिए. मूलतः यह लेख प्रो. हरी नारके का आलेख है जिसे 2008 में NCERT पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है. यह आलेख NCERT मेमोरियल लेक्चर सीरीज की एक कड़ी है. मैंने इन्टरनेट पर इसका हिंदी संस्करण ढूंढने की कोशिश की किन्तु NCERT ने मूल संस्करण (English) को ही अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है. इसलिए मुझे लगा कि यह अनुवाद का कार्य मुझे ही करना चाहिए. सावित्रीबाई फुले के बारे में इन्टरनेट पर हिंदी में जानकारी का अत्यंत अभाव है और ऐसे में इस प्रमाणिक लेख को देखकर इसका अनुवाद करने का मोह संवरण मै कर नहीं पाया. आखिर ज्ञान से ही चेतना का विकास होता है और चेतना क्रांति का मार्ग प्रशस्त करती है. इस उद्देश्य से जब अनुवाद करने बैठा तो इस त्याग और करुणा की दास्तान में कुछ यूँ उलझता गया कि कई बार भाव-विभोर हुआ तो कई बार आँखें भी भर आयीं. खैर, अनुवाद की भी कुछ समस्याएं होती हैं. और एक उत्कृष्ट अनुवाद में शब्दों से तो खेलना होता है, सबसे बड़ी कठिनाई तो भाषा की सहजता, शैली और मूल-भाव को ज्यों का त्यों बनाये रखने की होती है. शुद्धतावाद जैसे कुछ भाषाई दुराग्रह भी होते हैं जिनसे बचना होता है. वैसे अनुवाद की इकाई जितनी व्यापक होगी, अनुवाद उतना ही बेहतर होगा. इस तरह देखा जाय तो वाक्य से वाक्य का अनुवाद, अनुवाद की एक घटिया विधि है. अनुवाद का सबसे अच्छा आधार भाव इकाई होसकता है. एक पूरी भाव इकाई का अनुवाद. सामान्यतः इस भाव इकाई की सीमायें पैराग्राफ से तय होती हैं किन्तु ये कोई ऐसा बंधन नहीं जो अनुल्लंघ्य हो. शब्द, मै फिर से कहूँगा, अनुवाद के कार्य में निमित्त मात्र हैं. यदि शब्दों का उपयुक्त रूपांतर न मिले तो भी हम मूल-भाव से छेड़छाड़ नहीं कर सकते किन्तु भाव के लिए शब्दों को आवश्यकतानुसार बदला जासकता है. तो भी, इससे उपयुक्त शब्द-चयन की महत्ता कम नही होती.

एक अंतिम बात. अनुवाद कोई मौलिक कार्य नही है इसलिए मै खुद अपनी पीठ थपथपा ले रहा हूँ. इतना ही काफी है. पाठकगण प्रो. हरी नारके का धन्यवाद ज्ञापन करें जिन्होंने इतना महत्वपूर्ण आलेख लिखा और हमें एक महान महिला के बारे में इतना विस्तार से जानने-समझने का अवसर प्रदान किया. मै भी प्रो. नारके को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ.

दिनांक                                                                     सुधीर अम्बेडकर

28 अप्रैल, 2015                                                            अध्यापक

ज्ञानज्योति सावित्रीबाई फुले

प्रो. हरि नारके

“महात्मा फुले से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं. हम उनकी जितनी भी तारीफ करें, कम ही होगी. आखिर कोई कैसे उनके व्यक्तित्व का बखान कर सकता है! उन्होंने अपने पति का पूरा सहयोग किया और पथ में आई सभी बाधाओं का सामना उनके साथ किया. ऊँची जातियों की उच्चशिक्षित महिलाओं में भी इतना त्याग करने वाली महिला का मिलना मुश्किल है. दम्पति का जीवन जनकल्याण के कार्यों में ही बीता.”

—- नारायण महादेव उर्फ़ मामा परमानन्द (31 जुलाई, 1890)

महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत के सामाजिक और शैक्षिक इतिहास में एक असाधारण दम्पति हैं. वे सामाजिक न्याय और महिला व पुरुषों के बीच समानता लाने के लिए आन्दोलन स्थापित करने में लगे रहे. उन्होंने माना कि ज्ञान ही शक्ति है और इसके बिना महिलाओं और दलित-बहुजनों की प्रगति असंभव है और फिर उन्होंने अपने पूरे जीवन को ही इन वर्गों की शिक्षा के प्रसार में लगा दिया. देश में पहला देशी पुस्तकालय और लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोलने का श्रेय उन्ही को जाता है. 1854-55 में उन्होंने ‘साक्षरता मिशन’ की शुरुआत की. उस समय ब्राह्मणों में विधवाओं की स्थिति बहुत खराब थी. उनका शारीरिक और मानसिक शोषण होता था और जब वे गर्भवती होजाती थीं तो बच्चा पैदा होने पर घर में ही नवजात शिशु की हत्या कर दी जाती थी. 1863 में उन्होंने विधवा गर्भवती महिलाओं के लिए एक ‘विधवा आश्रम’ की स्थापना की ताकि ऐसी महिलाए सुरक्षित रहकर बच्चे को जन्म दे सकें और उसका पालन पोषण कर सकें. 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना करके उन्होंने ‘सत्यशोधक विवाह’ की शुरुआत की. इस प्रकार की शादियाँ बिना दहेज़ के और कम से कम खर्च में होती थीं. अपने घर के कुएं को अछूतों के लिए खोलकर ज्योतिबा फुले ने जाति-व्यवस्था का विरोध करने का कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया. ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई दोनों ने ही न केवल बाल-विवाह का विरोध किया बल्कि विधवा पुनर्विवाहों का भी आयोजन किया. उनकी अपनी कोई संतान नही थी लेकिन उन्होंने एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को गोद लिया और उसे ‘चिकित्सा विज्ञान’ की शिक्षा दिलाकर उसका अंतरजातीय विवाह कराया.

इस दम्पति ने देश शुद्रो-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए एक समग्र और एकीकृत क्रांतिकारी, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं शैक्षिक आन्दोलन का निर्माण करने का ऐतिहासिक कार्य किया. यह एक नए क्रान्तिकारी युग का सूत्रपात था.

स्वतंत्रता से पहले के युग में हम इस बात पर बहस देखते हैं कि सामाजिक और राजनीतिक सुधार में से किसे प्राथमिकता दी जाय. चूँकि ब्रिटिश शासन के रूप में हमें दुश्मन स्पष्ट दिखाई दे रहा था, अतः हमने राजनैतिक सुधार को प्राथमिकता दी. लोगों का विश्वास था कि एक बार अंग्रेजी दासता से हमें स्वतंत्रता मिल जाय तो हमारी सामाजिक समस्याएं स्वतः हल हो जायेंगी. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनका यह भ्रम टूटता गया. इस भ्रम के टूटने से ही सामजिक आन्दोलनों को बल मिला. सामाजिक न्याय के विभिन्न क्षेत्रों में आन्दोलन करने वाले नेताओं को यह अहसास हुआ कि ज्योतिराव और सावित्री बाई के कार्य और विचार आज भी उनका पथप्रदर्शन कर सकते हैं.

ज्योतिराव और सावित्रीबाई पर मराठी भाषा में 200 से अधिक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं. इसके साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु, कन्नड़, पंजाबी, उर्दू, सिन्धी और गुजराती में भी उन पर लिखी हुई पुस्तके प्रकाशित हुई हैं. इनमे 40 पुस्तकें सावित्रीबाई पर लिखी गयीं हैं.

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को पुणे से 50km दूर पुणे-सतारा मार्ग पर स्थित नैगांव (Naigaon) में हुआ था. वो अपने पिता खंडोजी पाटिल की सबसे बड़ी पुत्री थीं. 1840 में 10 वर्ष की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव के साथ हुआ था जोकि उस समय 13 वर्ष के थे. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि ज्योतिराव ने शादी के बाद सावित्रीबाई को घर पर ही शिक्षित किया था. उनकी आगे की शिक्षा की जिम्मेदारी ज्योतिराव के मित्र परांजपे और भावलकर ने संभाली. सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे के की संस्थाओं से अध्यापकीय प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था. इस दृष्टि से सावित्रीबाई भारत की पहली महिला अध्यापिका और प्रधानाध्यापिका थीं. घर की देहरी लांघकर बाहर पढ़ाने जाने के उनके इस कदम से आधुनिक भारतीय महिला के ‘सार्वजानिक जीवन’ का प्रारंभ होता है.

19 अक्टूबर 1882 को हंटर एजुकेशन कमीशन को दिए साक्ष्य में अपने शैक्षिक योगदान का उल्लेख करते हुए ज्योतिबा फुले ने कहा, “उस समय लड़कियों के लिए यहाँ कोई ऐसा स्कूल नहीं था जिसे ‘देशी’ कह पाते. इसलिए मुझे ऐसा स्कूल खोलने की प्रेरणा मिली. मैंने और मेरी पत्नी ने उस स्कूल में कई वर्ष कार्य किया.” एजुकेशन बोर्ड के चेयरपर्सन Arskin Perry और तत्कालीन भारतसचिव Lumsden ने स्कूल का भ्रमण किया और शिक्षा के क्षेत्र में इस नए आन्दोलन पर संतुष्टि व्यक्त की”

15 सितम्बर, 1853 को ‘ज्ञानोदय’ को दिए गए एक इंटरव्यू में ज्योतिबा फुले कहते हैं—– मुझे ऐसा लगा कि बच्चे के सुधार में माता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसलिए जो लोग इस देश की सुख-समृद्धि के लिए चिंतित हैं, उन्हें महिलाओं की बुरी दशा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और यदि वे वास्तव में चाहते हैं कि देश प्रगति करे तो उन्हें महिलाओं को ज्ञान प्रदान करने का हरेक प्रयास करना चाहिए. इसी विचार के साथ मैंने पहले लड़कियों के लिए स्कूल खोला. लेकिन मेरी जाति के लोगों को यह बात अच्छी नही लगी कि मै लड़कियों को शिक्षित करूँ और स्वयं मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया. न तो कोई स्कूल के लिए जगह देने के लिए तैयार था और न ही इसे बनाने के लिए मेरे पास धन था. लोग तो अपने बच्चों को स्कूल भेजने को ही तैयार नहीं थे लेकिन लाहूजी राघराउतमांग और रनबा महार ने अपने जाति-भाइयों को इस बात का विश्वास दिला दिया कि शिक्षित होने के बहुत फायदे होते हैं.”

ज्योतिबा फुले ने जब यह ऐतिहासिक कार्य प्रारंभ किया तो वे महज 21 वर्ष के थे और उनकी पत्नी सावित्रीबाई, जिन्होंने हर तरह से उनका साथ दिया, मात्र 18 वर्ष की थीं. जिस समुदाय को हजारों वर्षों तक शिक्षा से दूर रखा गया, उसी शुद्र समुदाय ने ऊँची जातियों द्वारा भड़काए जाने पर ज्योतिबा फुले के कार्य को ‘बुराई’ कहते हुए विरोध करना शुरू कर दिया. इस दम्पति का अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण इतना अधिक था कि उन्होंने इस कार्य को तब भी नही छोड़ा जबकि उन्हें घर छोड़ना पड़ा. अपनी जीविका(रोजी-रोटी) चलाने के लिए ज्योतिराव एक मिशनरी स्कूल में पार्ट-टाइम काम करते और बचा हुआ समय खुद के स्कूल में पढ़ाते जबकि सावित्रीबाई बिना किसी पारिश्रमिक(तनख्वाह) के पूरे समय पढ़ातीं थीं. उस समय के अखबार बताते हैं कि “कई बार तो यह दम्पति भूखे भी रह जाते थे.” एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि शिक्षा-प्रसार के इस महान आन्दोलन में तथाकथित अछूत जातियों के कुछ जागरूक लोगों ने बढ़-चढ़ कर योगदान दिया था. यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि इतिहास महात्मा फुले के इस आन्दोलन में उनके ब्राहमण सहकर्मियों के योगदान के बारे में तो बताता है किन्तु उनके दलित सहयोगियों के बारे में इतिहास प्रायः खामोश रहता है. वास्तव में तो, इस आन्दोलन में तथाकथित अछूतों के योगदान को क्रांतिकारी माना जाना चाहिए जिन्हें हजारो सालों से पढने लिखें का अधिकार नही था.

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई पुणे की दलित-मजदूरों की बस्ती में रहते थे. उनके सामाजीकारण में उनके आस-पास के सांस्कृतिक वातावरण ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बचपन में एक ब्राह्मण के कहने पर ज्योतिबा फुले के पिता ने उनकी पढाई-लिखाई बंद करवा दी थी. उस समय मुंशी गफ्फार बेग और Sir Lijit ने बालक ज्योतिबा की प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता से कहकर उनकी पढ़ाई फिर से शुरू करवा दी. इस बात को ज्योतिराव कभी नहीं भूले और सबसे पहला काम उन्होंने जो किया वो 1848 में उनके द्वारा दलित-मुस्लिम महिलाओं के लिए 1848 में स्कूल खोलना था.

महात्मा फुले शिक्षा के क्षेत्र में अपने इस आन्दोलन की वजह बताते हुए कहते हैं, “अज्ञानता, जातिगत और भाषाई भेदभाव इस देश में अभिशाप की तरह हैं. सवाल उठता है कि जब सब कोई दुखी है तो किसकी मदद की जाए. लेकिन इस सवाल से परेशान होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठने की जरुरत नहीं है. बजाय इसके जो सबसे ज्यादा पीड़ित हैं उनकी मदद की जाए. महार और मांग जातियों को जातिगत भेदभाव की वजह से यहाँ सर्वाधिक कष्ट झेलने पड़ते हैं. और उन्हें इस कष्ट से छुटकारा सिर्फ ज्ञान(शिक्षा) प्राप्ति से ही मिल सकता है. इसलिए सबसे पहले मैंने उन्ही के लिए कार्य शुरू किया.” ज्योतिबा फुले को इस बात पर पूरा विश्वास था कि अछूतों को शिक्षित करने से बड़ा और कोई कार्य इस देश के हित में नही किया जासकता है, और इसलिए वे अपने कार्य में लग गए.

इस महान कार्य को अकेले करने के बजाय उन्होंने एक मंडली स्थापित की ताकि उनके समान विचार रखने वाले लोग एक मंच पर आकर साथ-साथ कार्य कर सकें. ज्योतिबा जी ने दो संस्थाओं की शुरुआत की — देशी बालिका विद्यालय, पुणे और दूसरी— महारों और मांगों के शैक्षिक उत्थान के लिए सोसाइटी. इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने पुणे क्षेत्र में विद्यालयों का एक नेटवर्क तैयार कर दिया.

1848 में प्रारंभ हुआ यह कार्य कुछ कारणों से कुछ समय तक बाधित रहा. इसका विवरण हमें ‘बॉम्बे गार्डियन’ में छपी एक रिपोर्ट से मिलता है. इस रिपोर्ट के अनुसार, “जब सदाशिव गोवंदे ने अहमदनगर के जज कार्यालय में 1848 में कार्य शुरू किया तो वो वहां अपने मित्र ज्योतिबा फुले को ले गए. एक दिन दोनों मित्र Miss Farar के गर्ल्स स्कूल में गए. वहां की व्यवस्था देखकर उन्होंने इस बात पर अफ़सोस व्यक्त किया कि लड़कियों को अपने ही देश में शिक्षा नही दी जारही थी. फुले पुणे लौटे और उन्होंने इस कार्य को हाथ में लेने की योजना अपने दोस्तों को बतायी. मिस फरार के स्कूल से अपनी पत्नी को ट्रेनिंग दिलाकर उन्होंने स्कूल खोला. फिर उन्होंने एक और स्कूल खोला, महारों और मांगों के लिए. लेकिन छः महीनों के भीतर ही उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब उनके पिता ने लोगों के बहकावे में आकर उन्हें घर से निकाल दिया. और इस तरह विद्यालय का कार्य ठप्प हो गया. सदाशिव गोवंदे पुणे आये और सावित्रीबाई को अपने साथ नागर लेगए. वहां से वह बरसात की शुरुआत के समय लौट आयीं. तब केशवशिवराम भवालकर ने सावित्रीबाई को शिक्षित करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली. युवा महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कक्षाएं प्रारंभ करने का फैसला भी किया गया ताकि ऐसी महिलायें बाद में विद्यालयों में अध्यापन कार्य कर सकें. भावालकर ने ऐसी महिलाओं को खोजकर उन्हें प्रशिक्षित करने का कार्य किया.”

इस प्रकार, जो कार्य 1848 के अगस्त में प्रारंभ हुआ था, और जो कुछ समय तक बाधित रहा, 1851 में पुनः प्रारंभ होगया.

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार 1851 में पहली बार लड़कियों के लिए तीन विद्यालयों की स्थापना की गयी. सावित्रीबाई फुले इनमे से सबसे पहले स्थापित स्कूल की शिक्षिका और प्रधानाध्यापिका थीं. इस स्कूल की स्थापना 3 जुलाई,1851 को हुई थी. इनके सह-अध्यापक थे- विष्णुपंत मोरेश्वर और विट्ठल भास्कर. विद्यालय की शुरुआत के प्रथम दिन विद्यालय में आठ लड़कियां थीं, किन्तु जल्द ही उनकी संख्या अठतालीस(48) तक पहुँच गयी.

विद्यालय निरीक्षक दादोवा पांडुरंग ने 16 अक्टूबर,1851 को विद्यालय का निरीक्षण किया और लड़कियों की प्रगति की जांच की. हालांकि अभी ज्यादा समय नही बीता था तो भी लड़कियों की प्रगति उल्लेखनीय थी. विद्यालय की प्रथम वार्षिक परीक्षा 17 फरवरी, 1852 को आयोजित की गयी जबकि दूसरी वार्षिक परीक्षा पूना कॉलेज में 12 फरवरी, 1853 को आयोजित की गई. ये रिपोर्टें बताती हैं कि पुणे में आयोजित परीक्षा को देखने लिए अप्रत्याशित भीड़ इकट्ठी हुई. लगभग तीन हजार लोग कॉलेज के परिसर में जमा थे और इससे भी ज्यादा लोग बाहर इंतजार कर रहे थे. दो सौ सैंतीस लड़कियां परीक्षा में सम्मिलित हुईं. कॉलेज के खातों का वार्षिक परीक्षण हुआ. 1947 रुपये का संग्रह दान और हिस्सेदारी से हुआ. सरकार ने भी 900 रुपये की वितीय सहायता ‘दक्षिणा प्राइज फण्ड’ से प्रदान की.

अछूतों के लिए खोले गए विद्यालयों की रिपोर्टें भी संग्रहालय में मौजूद हैं. 1858 में आयोजित परीक्षा की रिपोर्ट आर्काइव्ज में उपलब्ध है. इस संस्था के तीन स्कूल थे और इसके विस्तार की योजना भी थी. किन्तु 1857 के विद्रोह के बाद सरकार ने वित्तीय सहायता में कमी कर दी जिससे कि यह संस्था गंभीर वित्तीय संकट में पड़ गई. रिपोर्ट में इस तथ्य पर अफ़सोस प्रकट किया गया है कि बिलकुल तब जबकि अछूतों में शिक्षा के प्रति ललक पैदा होने लगी थी उसी समय स्कूल बंद होने के कगार पर पहुँच गया. इन तीन विद्यालयों में कुल मिलाकर दो सौ अट्ठावन विद्यार्थी अध्धयनरत थे. ज्योतिबा जी के सहकर्मी गनु शिवाजी मांग और धूराजी अप्पाजी चम्भर भी इन विद्यालयों में अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे थे. सरकार को भेजे एक पत्र में संस्था के एक कर्मचारी ने लिखा है, “अध्यापकों को अच्छा वेतन नहीं दिया जासकता क्यूंकि संस्था की आर्थिक स्थिति ठीक नही है. इसलिए अध्यापक उन विद्यालयों में जाना पसंद करते हैं जो अधिक वेतन देते हैं. अध्यापकों का इस तरह विद्यालय छोड़ना विद्यालय के लिए बड़ी क्षति है. विद्यालय की प्रधानाध्यापिका, सावित्रीबाई ने उदारभाव से अपने जीवन को महिलाशिक्षा के सुधार के प्रति समर्पित कर दिया है और यह महान कार्य वे बिना किसी पारिश्रमिक के कर रही हैं. हमें आशा है कि सुचना और ज्ञान के प्रसार के साथ ही लोग महिला शिक्षा के लाभों को समझने लगेंगे.”

एजुकेशन बोर्ड के चेयरपर्सन, माननीय जॉन वार्डन ने एक सार्वजनिक समारोह में स्कूल के बारे में इस तरह वर्णन किया—–“कमिश्नर के रूप में जब पहली बार 1851 में पुणे आया, तो मैंने वहां के गर्ल्स स्कूल का भ्रमण किया. वहां जाने पर मुझे याद आया कि किस तरह यहूदियों के डर से क्रिस्चियन(ईसाई लोग) शुरुआत में अपने स्कूलों को दूसरी मंजिल पर दरवाजे बंद करके चलाते थे. विद्यालय की अध्यापिका एक माली की पत्नी थी. इस आदमी ने अपनी पत्नी को पढ़ाया-लिखाया था ताकि वह अपने देशवासियों के उत्थान में योगदान कर सके और उन्हें अज्ञानता से मुक्ति दिलाने में मदद कर सके. मैंने उस महिला से अपनी उपस्थिति में लड़कियों से कुछ सवाल करने को कहा. कुछ विवाहित युवतियों के लिए वहां प्रशिक्षण कक्षाएं भी चलायी जारही थीं.”

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले के प्रयासों की प्रगति उल्लेखनीय थी. इस बात का पता कुछ यूँ चलता है कि उच्च जाति के लड़कों के लिए सरकारी विद्यालय थे. इनमे से एक विद्यालय ने 29 मई, 1852 के ‘पूना आब्जर्वर’ में महिलाओं की शिक्षा से पुरुष वर्चस्व टूटने की अपनी आशंकाओं को जाहिर करते हुए लिखा,—-“ज्योतिराव के स्कूल में पढने वाली लड़कियों की संख्या सरकारी विद्यालयों में पढने वाले लड़कों की संख्या से दस गुनी ज्यादा है. और ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी विद्यालयों में प्रचलित व्यवस्था की तुलना में लड़कियों के विद्यालयों में पढाई-लिखाई की व्यवस्था बहुत ज्यादा अच्छी है. यदि यह स्थिति यूँ ही बनी रहती है तो ज्योतिराव के स्कूल की लड़कियां सरकारी स्कूलों के लड़कों से ज्यादा श्रेष्ठ साबित होजायेंगी. और यदि गवर्नमेंट एजुकेशन बोर्ड जल्द ही इस सम्बन्ध में कोई कदम नहीं उठाता है तो इन महिलाओं को पुरुषों से आगे निकलते देखकर हमारे सिर शर्म से झुक जायेंगे.”

ज्योतिबा फुले के कार्य के महत्व को समझते हुए, ब्रिटिश सरकार ने 16 नवम्बर 1852 को उन्हें शॉल भेंटकर सम्मानित किया. हालांकि कट्टरपंथियों को यह बात बिलकुल नही सुहायी कि ज्योतिबा फुले जैसे शुद्र को शॉल (महावस्त्र) भेंट कर सम्मानित किया जाय.

फुले दम्पति ने लड़कों और लड़कियों की शिक्षा को व्यवसायपरक बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया ताकि वे अपने पैरों पर खड़े होसकें और स्वतंत्र होकर सोच सकें और उन्होंने ऐसी व्यवस्था का निर्माण भी किया.

विद्यार्थियों द्वारा विद्यालय छोड़ने (ड्राप-आउट) की समस्या उन दिनों और भी ज्यादा गंभीर थी. फुले और उनके सहयोगियों ने इसके लिए व्यावहारिक समाधानों की खोज की. उन्होंने पाया कि ड्राप-आउट की सबसे बड़ी वजहें थीं— गरीबी और शिक्षा के प्रति रूचि का अभाव. उन्होंने विद्यार्थियों को ‘सैलरी’ देने की व्यवस्था की और पाठ्यक्रम का निर्माण इस तरह से किया ताकि यह गरीब तबकों के विद्यार्थियों की जरूरतों पर खरा उतर सके. उन्होंने एक जागरूकता अभियान भी चलाया जिसके माध्यम से दलित-बहुजनों को शिक्षा से होने वाले लाभों से परिचित कराया गया. ये प्रयास यहीं तक सीमित नही थे. उन्होंने माता-पिताओं के लिए भी एक साक्षरता अभियान चलाया और इस तरह उन्होंने एक ‘समग्र शैक्षणिक परियोजना’ का निर्माण किया. ड्राप-आउट के जो कारण थे, जैसे- जात्राखेत्र (मेले और तीर्थभ्रमण), जाति-पंचायतें, अन्धविश्वास और गरीबी; और इन कारणों का जिस तरह ज्योतिबा फुले ने समाधान तलाशा, वे तरीके आज भी प्रासंगिक हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में आदिवासी लड़कों और लड़कियों के ड्राप-आउट को रोकने के लिए ‘उपस्थिति भत्ता’ Attendence Allowance नामक योजना शुरू की है.

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हमेशा ही इस बात पर जोर दिया कि “शिक्षा द्वारा व्यक्ति में यह योग्यता विकसित की जानी चाहिए जिसके द्वारा वह जीवन में सही-गलत और सत्य-असत्य का भेद करके उनके बीच चुनाव कर सके.” विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के विकास के लिए भी विशेष प्रयास कर रहे थे. वे इस दिशा में कहाँ तक सफल हुए, इस बात का पता इस घटना से चलता है जब विद्यालय के एक समारोह में एक छोटी लड़की पुरस्कार ग्रहण करने मंच पर गई, तो मुख्य अतिथि को संबोधित करते हुए उसके मुंह से ये शब्द निकल पड़े——“सर, पुरस्कार के रूप में हमें खिलौने नहीं चाहिए, हम अपने स्कूल के लिए एक पुस्तकालय चाहते हैं.” उस लड़की के माता-पिता को शिकायत थी कि यह लड़की आधी रात तक पढने-लिखने में लगी रहती है. सरकारी निरीक्षकों ने स्कूल के स्वस्थ वातावरण, रुचियों के परिष्कार, सृजनात्मकता और चरित्र निर्माण पर दिए जारहे ध्यान इत्यादि की प्रशंसा की.

सावित्रीबाई की एक मतंग(अछूत) छात्रा ने 1855 में एक आत्मकथात्मक निबंध लिखा जब वह मात्र 14 वर्ष की थी. यह निबंध इतना महत्वपूर्ण है कि इसे मराठी साहित्य में एक बड़ा मील का पत्थर माना जासकता है. इस निबंध से आधुनिक दलित साहित्य की शुरुआत भी मानी जासकती है. वह लिखती है—–“ये लड्डूखाऊ (लड्डू खाने वाले) ब्राह्मण कहते हैं कि वेदों पर सिर्फ उनका एकाधिकर है. गैर-ब्राह्मणों को वेदों को पढने का अधिकार नही है. क्या इससे यह साबित नही होता कि हमारा कोई धर्म नहीं है क्योंकि हमें धर्म ग्रंथों में झांकने तक का अधिकार नहीं है? हे भगवान्, कृपा करके हमें बताओ हम किस धर्म का पालन करें. ‘ज्ञानोदय’ के सम्पादक ने जब इस लड़की के निबंध के बारे में सुना तो अत्यंत चकित हुआ और उसके क्रांतिकारी विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ. उसने अपने समाचारपत्र में इसे दो भागों में 15 फरवरी और 1 मार्च, 1855 को प्रकाशित किया. यह निबंध उस साल की बॉम्बे प्रेसीडेंसी एजुकेशन रिपोर्ट में भी प्रकाशित हुआ था.

सावित्रीबाई फुले को समाज का कटु विरोध झेलना पड़ा, उन्हें लोगों की गालियाँ भी सहनी पड़ीं, किन्तु उन्होंने अपना महान कार्य जारी रखा. लोग उन पर अश्लील टिप्पणियां करते और कभी-कभार तो वे उन पर पत्थर, कीचड और गोबर भी मारते थे. ये महान महिला सावित्रीबाई स्कूल जाते वक्त दो साड़ियाँ लेजाती थीं और कीचड से सनी हुई साड़ी को स्कूल में जाकर बदलती थीं किन्तु लौटते वक्त नयी साड़ी भी गन्दी होजाती थी. इसके बावजूद उन्होंने अपना कार्य दृढ़तापूर्वक और बिना रुके जारी रखा. यह दुर्व्यवहार इस हद तक बढ़ गया था कि संस्था को उनके और लड़कियों के लिए एक गार्ड रखना पड़ा. सावित्रीबाई खुद को परेशान करने वाले लोगों को जो जबाब, जो प्रतिक्रिया देतीं थीं, उस जबाब, उस प्रतिक्रिया का जिक्र बलवंत सखाराम कोल्हे ने अपने एक संस्मरण में किया है—“चूँकि मै अपनी बहनों को शिक्षा देने का पवित्र कार्य कर रही हूँ इसलिए तुम लोग ये जो पत्थर और गोबर मुझ पर फेंकते हो, वो मुझे फूलों जैसे लगते हैं. भगवान् तुम्हे आशीष दे!” सखाराम कोल्हे की ये स्मृतियाँ सावित्रीबाई के दृढ चरित्र और साहस पर प्रकाश डालती हैं.

सावित्रीबाई और ज्योतिबाफुले द्वारा 1863 में शुरू किये गए “शिशुहत्या के विरुद्ध संरक्षण ग्रह” के बारे में सही जानकारी अभी हाल में ही उपलब्ध हो पायी है. इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘घर’ केवल ‘ब्राह्मण विधवाओं’ के लिए ही खोला गया था और सावित्रीबाई ने ही इसकी पहल की थी. इस सम्बन्ध में समस्त जानकारी ज्योतिबा फुले द्वारा 4 दिसम्बर, 1884 को बम्बई सरकार के अवर सचिव को लिखे गए पत्र में दर्ज की गयी है.

यहाँ पर एक घटना का उल्लेख करना पाठकों के लिए लाभप्रद रहेगा. ज्योतिबाफुले के मित्र गोवंदे के यहाँ एक युवा ब्राह्मण विधवा काशीबाई रसोइये के रूप में कार्य करती थी. काशीबाई एक गरीब किन्तु एक सुन्दर महिला थी और एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थी. पड़ोस में रहने वाले एक कुटिल शास्त्री ने इस अनपढ़ महिला का फायदा उठाया जिसके फलस्वरूप वह गर्भवती होगई. जब गर्भपात का कोई उपाय सफल नही हुआ तो उसने एक सुन्दर शिशु को जन्म दिया. चूँकि उस शास्त्री ने इस शिशु को अपनाने से इनकर कर दिया तो काशीबाई बुरी तरह से फंस गयी. अब उसे समाज का भय था कि समाज उसे जीने नहीं देगा इसलिए उसने मासूम शिशु की गला रेत कर हत्या कर दी. गोवंदे के आँगन में स्थित कुएं में उसने शव को फेंक दिया. बाद में पता चलने पर उस पर मुकद्दमा हुआ और उसे अंडमान में ‘काले पानी’ की सजा हुई. यह घटना 1863 में घटित हुई. पहली बार किसी महिला को इतनी कठोर सजा मिली थी.

इस घटना से सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले बहुत परेशान और दुखी हुए. उस समय उनकी आय बहुत सीमित थी. हालांकि उन्हें रोजी-रोटी के भी लाले पड़ रहे थे फिर भी उनका ह्रदय करुणा और उदारता का सागर था. उन्होंने बिना देर किये 395, गंजपेठ, पुणे स्थित अपने मकान में ऐसी ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक आश्रयगृह (शेल्टर होम) की शुरुआत कर दी. पूरा देश जबकि इस घटना की चर्चा में मशगूल था, फुले दम्पति ने इन शोषित महिलाओं के लिए वास्तविक कार्य किया. उन्होंने पूरे शहर और तीर्थस्थलों पर “काले पानी से बचने का उपाय” की घोषणा करते हुए विज्ञापन (पोस्टर) लगा दिए और इस प्रकार शेल्टर होम के बारे में जानकारी फैलती गई. 1884 में विभिन्न स्थानों से 35 ब्राह्मण विधवाएं शेल्टर होम में रह रहीं थीं. सावित्रीबाई उन महिलाओं के प्रसव में स्वयं ही मदद करती थीं, और उनकी देख-भाल भी करती थीं.

1874 में एक और शोषित ‘काशीबाई’ उनके पास आई और उन्होंने उसके पुत्र को गोद ले लिया. उन्होंने इस बच्चे का पालन-पोषण किया और उसे शिक्षित करके डॉक्टर बनाया. बाद में उसने फुले दम्पति द्वारा प्रारंभ किये गए कार्य को आगे बढाया. 10 जुलाई, 1887 को ज्योतिबा फुले ने अपनी बसीयत लिखी और इसे उपनिबंधक कार्यालय में पंजीकृत कराया. इस बसीयत में महात्मा फुले बड़े गर्व के साथ लिखते हैं कि सावित्रीबाई इन सभी महिलाओं की देख-भाल अपनी पुत्री मानकर करेगी.

ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक और आन्दोलन की शुरुआत ‘दीनबंधु’ के संपादक नारायण मेघाजी लोखंडे ने शुरू की थी जिसकी प्रेरणा सावित्रीबाई फुले ही थीं. इस आन्दोलन का उद्देश्य ब्राह्मण विधवाओं के सर मुंड़ाने की प्रथा को ख़त्म करना था. इसके लिए लोखंडे ने नाइयों को संगठित करके उनकी हड़ताल आयोजित की थी. इस ऐतिहासिक हड़ताल की खबर 9 अप्रैल, 1890 के ‘The Times’ में छपी थी. इंग्लैंड की महिलाओं ने भी इसके लिए उन्हें पत्र लिखकर बधाईयाँ प्रेषित की थीं.

भाग-2

1877 में महाराष्ट्र भयंकर सूखे का सामना कर रहा था. ऐसे में, लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले फुले दम्पति के लिए चुप बैठना संभव नहीं था हालांकि वे खुद विषम परिस्थितियों से गुजर रहे थे. और बहुत हद तक, ऐसे समय में दम्पति ने गांव-गांव जाकर धन एकत्रित किया. डॉ शिवप्पा जैसे अपने मित्रों की सहायता से उन्होंने ‘विक्टोरिया बालाश्रम’ शुरू किया जहाँ प्रतिदिन एक हजार गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन कराया जाता था. सावित्रीबाई अपनी मित्रों की सहायता से स्वयं इस भोजन को पकाती थीं. लेकिन इसे क्या कहेंगे कि इसी समय, विष्णुशास्त्री चिपलूनकर जैसे महाराष्ट्र के ‘युग प्रवर्तक चिन्तक’ मराठी व्याकारण की बदतर होती स्थिति पर निबंध लिखने में लीन थे.

फुले दम्पति दूरवर्ती स्थानों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए अपने घर में छात्रावास भी चला रहे थे. मुंबई से एक स्टूडेंट लक्ष्मण कराडी जाया उनके हॉस्टल में रहा था और उसने सावित्रीबाई की मां जैसी देख-भाल और चिंताएं महसूस की थीं. अपने संस्मरणों में उसने लिखा है—“मैंने सावित्रीबाई जैसी इतनी दयालु महिला नहीं देखी. उन्होंने मुझे मां से भी अधिक प्यार दिया.”

एक अन्य स्टूडेंट ने अपने संस्मरणों में सावित्रीबाई के स्वभाव, उनकी अति सादगीपूर्ण जीवन शैली और उनके और ज्योतिबा फुले के अपार प्रेम के बारे में एक मर्मस्पर्शी नोट लिखा है. यह लड़का, जिसका नाम महदू सह्दू वाघोले था, लिखता है—“वे बहुत उदार थीं और उनका ह्रदय दयालुता से पूर्ण था. गरीबों और जरुरतमंदों के प्रति वे अत्यंत करुणाशील थी. वे भूखों को भोजन का दान करती रहती थीं. यदि वे किसी गरीब महिला को फटे-पुराने चीथड़ों में देखतीं, तो अपने घर उसे साड़ियाँ निकाल कर दे देतीं थीं. उनकी इन आदतों से घर के खर्चे बढ़ते गए. तात्या (ज्योतिबा फुले) उनसे कभी-कभार कहते कि किसी को इतना ज्यादा खर्च नहीं करना चाहिए. इस पर वे मुस्कराकर जबाब देतीं, “मरेंगे तो क्या ले जायेंगे!” इसके बाद तात्या चुप होजाते क्यूंकि उनके पास कोई जबाब नहीं होता. वे एक-दूसरे से अथाह प्रेम करते थे.

महिलाओं के उत्थान को लेकर सावित्रीबाई अत्यधिक चिंतित^ थीं. वो एक सुन्दर दिखने वाली और मध्यम कद-काठी की महिला थीं. उनका व्यवहार अत्यंत शांत एवं संयत था. उनके संयत स्वभाव से ऐसा लगता था जैसे कि वो गुस्सा जानती ही न थीं. उनकी मुस्कान अत्यंत रहस्यमयी होती थी. सब कोई उन्हें ‘काकू’ कहकर पुकरता था. अतिथियों के घर पर आने से वो बहुत प्रसन्न होती और स्वयं उनके लिए पकवान बनाती. ज्योतिराव सावित्रीबाई का बहुत सम्मान करते थे और सावित्रीबाई उन्हें ‘सेठजी’ कहकर बुलाती थीं. उनके बीच सच्चा प्रेम था. ज्योतिबाफुले कभी ऐसा कोई कार्य नही करते थे जिसमे सावित्रीबाई की सहमति न होती.

सावित्रीबाई एक दूरदर्शी और सुलझी हुई महिला थीं. उनके रिश्तेदारों और सामाजिक संपर्कों में उनकी बहुत इज्ज़त थी. एक गर्ल्स स्कूल की अध्यापिका होने के कारण नवशिक्षित महिलाओं में भी उनके लिए बहुत आदर था. अपने पास आने वाली सभी महिलाओं और लड़कियों को वो हमेशा सलाह और मार्गदर्शन प्रदान करतीं थी. पंडिता रमाबाई, आनंदीबाई जोशी और रमाबाई रानाडे सहित पुणे की कई सुविख्यात महिलायें उनसे मिलने आती थीं.

तात्या(ज्योतिबा फुले) की तरह सावित्रीबाई भी सादे वस्त्र पहनती थें. एक मंगलसूत्र, गले में काले मनकों की एक माला और एक बड़े से ‘कुंकू’ (सिंदूर का टीका) के अलावा वे अन्य कोई आभूषण नही पहनती थीं. सूर्योदय से पहले ही वो घर की साफ-सफाई और स्नान कर लेती थीं. उनका घर हमेशा स्वच्छ रहता था. घर में बर्तन हमेशा दमकते हुए और सुव्यवस्थित रहते थे. भोजन वो स्वयं पकाती थीं और तात्या के स्वास्थ्य और आहार का बहुत ध्यान रखती थीं.”

यह वर्णन उस व्यक्ति का है जो स्वयं उनके साथ रहा था. यह वर्णन एक क्रान्तिकारी महिला के घरेलू दैनिक जीवन के बारे में एक प्रमाणिक टिपण्णी है.

सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर, 1873 को हुई और सावित्रीबाई फुले इस संस्था की एक अत्यधिक समर्पित कार्यकर्त्री(activist) थीं. ये संस्था कम से कम खर्चे पर, दहेज़मुक्त और बिना पंडित-पुजारियों के विवाहों का आयोजन कराती थी. इस तरह का पहला विवाह 25 दिसम्बर,1873 को संपन्न हुआ. संस्था की पहली रिपोर्ट गर्व के साथ इस बात का उल्लेख करती है कि सदियों पुरानी इन धार्मिक परम्पराओं को नकर के रचनात्मक विद्रोह की इस क्रांतिकारी पहल के पीछे सावित्रीबाई फुले की प्रेरणा थी. सावित्रीबाई की मित्र बाजूबाई निम्बंकर की पुत्री राधा और activist सीताराम जबाजी आल्हट की शादी पहली ‘सत्यशोधक शादी’ थी. इस ऐतिहासिक अवसर पर सावित्रीबाई ने स्वयं सभी खर्चे वहन किये.

इस प्रकार के विवाहों की पद्धति पंजीकृत विवाहों से मिलती जुलती होती थी जो आज भी भारत के कई भागों में पाई जाती है. पूरे देश के पुजारियों ने इन विवाहों का विरोध किया और वे इस मुद्दे को लेकर कोर्ट में भी गए. फुले दम्पति को कठोर परेशानियों का सामना करना पड़ा किन्तु इससे वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए. 4 फरवरी, 1889 को उन्होंने अपने दत्तक पुत्र की शादी भी इसी पद्धति से की. यह विवाह आधुनिक भारत में पहला अंतरजातीय विवाह था.

‘सत्यशोधक विवाह’ में दुल्हे को ये शपथ लेनी होती थी कि वह महिलाओं को शिक्षा का अवसर प्रदान करेगा और महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करेगा. शादी के समय ‘मंगलाष्टक’ मन्त्रों का गायन दूल्हा-दुल्हन द्वारा किया जाता था. ये मंत्रगीत दूल्हा-दुल्हन द्वारा एक-दूसरे के प्रति ली गयी शपथों के रूप में होते थे. यशवंत का विवाह राधा उर्फ़ लक्ष्मी से इसी पद्धति से हुआ था. राधा सत्यशोधक समाज के नेता ज्ञानोवा कृष्णाजी ससाने की पुत्री थीं. सावित्रीबाई ने राधा को शादी से पहले ही अपने घर में बुला लिया था ताकि वह और यशवंत एक-दूसरे से परिचित होने के साथ-साथ एक-दूसरे की पसंद-नापसंद से भी परिचित हो सकें. उन्होंने राधा की शिक्षा का भी बंदोबस्त किया.

इस दौरान सावित्रीबाई(काकू) का राधा के साथ जो व्यवहार था, उसका जिक्र ज्योतिबाफुले द्वारा 24 सितम्बर, 1888 को लिखे एक पत्र में मिलता है. वे लिखते हैं, “मेरी पत्नी ने घर की सारी जिम्मेदारियां खुद ही संभाल रखी हैं और उसने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि लक्ष्मी को फुर्सत मिले ताकि उसकी पढाई सुचारू रूप से चलती रहे.” सावित्रीबाई कोई घमंडी, और उत्पीड़क सास नहीं थीं बल्कि वे तो एक ऐसी सास थीं जो खुद ही घर की सारी जिम्मेदारी सम्भाल कर अपनी बहू को पढने के लिए प्रोत्साहित करती थीं.

1887 में ज्योतिबाफुले को को दिल का दौरा पढ़ा जिससे उनका दाहिना भाग पूरी तरह से लकवाग्रस्त होगया. सावित्रीबाई ने इस बीमारी में दिन-रात उनकी देख-भाल की. वे ठीक होगये और यहाँ तक कि उन्होंने फिर से लेखन कार्य शुरू कर दिया. यह ऐसा समय था जब वे वित्तीय संकट से गुजर रहे थे. ‘पूना कंस्ट्रक्शन ठेका कंपनी’ का बिज़नेस ठप्प होने लगा थे, आय के श्रोत भी कम होते जारहे थे और खर्चे बहुत ज्यादा थे. दम्पति की बुद्धि भी जबाब देने लगी थी. बीमारी का खर्च, विधवा-शिशुहत्या निरोधी संरक्षण गृह, हॉस्टल का रख-रखाव, सत्यशोधक समाज और बच्चों की शिक्षा. इन सब का आर्थिक बोझ उन पर था. फिर एक ऐसा समय भी आया जब उनके पास इलाज के लिए भी पैसा न बचा और डॉ विश्राम रामजी ने उनका मुफ्त इलाज किया.

ज्योतिबा फुले के शुभचिंतक, महान विचारक, और ‘राजनीतिक संत’ मामा परमानन्द ने बडोदा के राजा सयाजीराव गायकबाड़ को फुले दम्पति की वित्तीय मदद करने हेतु एक पत्र लिखा. 31 जुलाई, 1890 को लिखे इस पत्र में उन्होंने फुले दम्पति द्वारा किये जारहे ऐतिहासिक कार्य का उल्लेख किया है. एक समकालीन चिन्तक द्वारा उनके कार्य का यह मूल्यांकन बहुत महत्वपूर्ण है— “बहुत ही विषम परिस्थितियों में ज्योतिराव ने अपनी पत्नी को शिक्षित किया और उनके (पत्नी) द्वारा ब्राह्मण लड़कियों को शिक्षित किया और वो भी कट्टरपंथियों की इच्छा के विरुद्ध उन्ही के गढ़ में उन्होंने यह कार्य किया. कट्टरपंथियों के गढ़ में महार और मांग जातियों के लिए स्कूल खोलना और उन्हें संचालित करना शेर पर गुर्राने के समान था. ज्योतिराव से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं. हम उनकी जितनी भी तारीफ करें, कम ही होगी. आखिर कोई कैसे उनके व्यक्तित्व का बखान कर सकता है! उन्होंने अपने पति का पूरा सहयोग किया और पथ में आई सभी बाधाओं का सामना उनके साथ रहकर किया. ऊँची जातियों की उच्चशिक्षित महिलाओं में भी इतना त्याग करने वाली महिला का मिलना मुश्किल है. दम्पति का जीवन जनकल्याण के कार्यों में ही बीता.”

इसके बाद मामा परमानन्द ने 9 अगस्त, 1890 को तत्काल आर्थिक मदद का अनुरोध करते हुए एक और पत्र लिखा—“ज्योतिबाफुले ने अपना जीवन निस्वार्थ जन-सेवा में बिताया है और आज वे लाचारी का जीवन जी रहे हैं. वास्तव में उन्हें अविलम्ब मदद की जरुरत है.”

बड़ोदा के राजा की नजर में ज्योतिबा फुले के कार्य का बहुत सम्मान था लेकिन यह संभव है कि उच्च जाति के अधिकारियों ने राजा के पास ये पत्र पहुँचने ही न दिए हों. इसी दौरान, 28 नवम्बर, 1890 को ज्योतिराव इस बीमारी के चलते गुजर गए. दिसम्बर, 1890 को मामा ने एक तीसरा पत्र लिखा, जिसमे उन्होंने लिखा—“उस महान आत्मा ने कभी भी अपने सुख-दुःख को महत्व नहीं दिया. वह केवल अपनी पत्नी और अपने दत्तक पुत्र, यशवंत के लिए चिंतित थे. कम से कम अब तो उनके परिवारजनों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाय.” जिद्दी मामा ने हार नहीं मानी और इस मामले को लेकर डेढ़ साल तक राजा के पीछे पड़े रहे. उन्होंने यशवंत के नाम से मदद के लिए एक और आवेदन किया. अभी तक सावित्रीबाई और यशवंत, मामा परमानंद और ज्योतिराव के एक अन्य मित्र रामचंद्रराव धमनास्कर द्वारा उपलब्ध करवाई बहुत थोड़ी सी मदद पर गुजारा कर रहे थे.

आख़िरकर, 10 फरवरी, 1892 को महाराजा सयाजीराव ने 1000 रुपये का चेक सावित्रीबाई के लिए दिया. इस राशि का निवेश तुकारामतात्या पडवाल की ‘नारायण कंपनी’ में कर दिया गया और तिमाही पर मिलने वाली ब्याज की राशि सावित्रीबाई को भेजी जाने लगी. 2 मार्च, 1892 को धमनास्कर ने मामा को एक पत्र भेजा, जिसमे लिखा था—“महाराजा का विचार है कि ज्योतिबाफुले की स्मृति में एक बड़ा सा स्मारक बनाया जाना चाहिए. महाराजा इस स्मारक हेतु एक बड़ी राशि का योगदान करेंगे.” उन्होंने यह भी लिखा कि महाराजा ने चिंतित होते हुए सावित्रीबाई के हाल-चाल के बारे में पूछा. खैर, यह स्मारक कभी वास्तव में आकर नहीं ले पाया.

ज्योतिबा फुले की मृत्यु के वक्त सावित्रीबाई उनके साथ ही थीं. अपनी बसीयत में ज्योतिबाफुले ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि मृत्यु के बाद चिता पर जलाने के बजाय उन्हें नमक से ढँक कर दफनाया जाय. लेकिन चूँकि नगरपालिका के अधिकारियों ने आवासीय भूमि पर दफ़नाने की अनुमति नहीं दी और कोई दूसरा विकल्प भी न था, अतः ऐसी स्थिति में उनके मृत शरीर को आग की ज्वालाओं के हवाले कर दिया गया. वहां एक परंपरा थी. जो कोई भी अंतिम यात्रा में तित्वे (मिटटी का लोटा, जिसमे मृतक के दहन से पहले उसके चारों तरफ छिडकने के लिए जल रखा जाता है) को थाम कर चलता है, उसी को मृतक का उत्तराधिकारी माना जाता है और वही मृतक की संपत्ति पाता है. यही सोचकर ज्योतिराव का भतीजा आगे आया और यशवंत के तित्वा थामने के अधिकार पर विवाद करने लगा. इस समय, सावित्रीबाई साहसपूर्वक आगे आयीं और उन्होंने ‘तित्वे’ को स्वयं थाम लिया. वे ‘तित्वे’ को थामकर शवयात्रा के आगे-आगे चलीं और स्वयं उन्होंने अपने पति को मुखाग्नि दी. भारत के इतिहास के एक हजार वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी महिला ने अंतिम संस्कार किया. 30 नवम्बर को उनकी अस्थियाँ घर लायी गयीं और औपचारिक तरीके से उनकी अस्थियों को उस स्थान पर दफ़न कर दिया गया जिसे ज्योतिबा फुले ने इस उद्देश्य के लिए तैयार किया था. सावित्रीबाई ने वहां पर एक ‘तुलसी वृन्दावन’ का निर्माण किया. यह आज भी देखा जासकता है. पत्थर की सादा पादुकाएं इसके नीचे रखी हुई हैं. सावित्रीबाई ने ज्योतिबाफुले की स्मृतियों को अमर बनाने के लिए इस प्रकार अपने घर के पिछवाड़े में एक मेमोरियल तैयार कर दिया.

ज्योतिबाफुले की मृत्यु के बाद ‘सत्यशोधक आन्दोलन’ का नेतृत्व अपने जीवन के अंत तक सावित्री बाई ने किया. चिकित्साशास्त्र की शिक्षा पूरी करने के बाद यशवंत ने सेना में नौकरी कर ली. अपने कार्य के सिलसिले में यशवंत कई देशों की यात्रा किये. एक बार जब 1895 में वे ऐसी ही एक यात्रा पर थे, उनकी पत्नी राधा(लक्ष्मी) गुजर गयी. अब सावित्रीबाई घर पर अकेली रह गयीं.

1893 में सास्वाड़ में आयोजित सत्यशोधक सम्मेलन की अध्यक्षता सावित्रीबाई फुले ने की थी. 1896 के अकाल में उन्होंने बहुत काम किया. अगले साल 1897 में प्लेग की भयंकर महामारी फ़ैल गयी. पुणे क्षेत्र में प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस प्रकोप से मर रहे थे. गवर्नमेंट ने इस महामारी पर नियंत्रण पाने की जिम्मेदारी रांड नामके अधिकारी को सौंपी. सावित्रीबाई ने यशवंत को छुट्टी लेकर आने को कहा और यशवंत के लौटने पर उनकी मदद से उन्होंने सासने परिवार के खेतों में एक हॉस्पिटल खुलवाया. वे बीमार लोगों के पास जातीं और खुद ही उनको हॉस्पिटल तक लेकर आतीं थीं. हालांकि वो जानती थीं कि ये एक संक्रामक बीमारी है फिर भी उन्होंने बीमार लोगों की सेवा और देख-भाल करना जारी रखा.

इस महामारी से निपटने का कार्य चल रहा था. सावित्रीबाई इस कार्य में पूरे समर्पण और तन्मयता से लगी हुईं थीं. एक दिन की बात है. किसी ने उन्हें प्लेग से ग्रसित एक बच्चे के बारे में बताया. जैसे ही उनको पता चला कि मुंधवा गाँव के बाहर महारों की बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकबाड़ का पुत्र प्लेग से पीड़ित होगया है, वो वहां गयीं और बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर हॉस्पिटल लेकर दौड़ीं. इस प्रक्रिया में यह महामारी उनको भी लग गयी और 10 मार्च, 1897 की देर शाम को आखिरकर उनकी साँसे हमेशा के लिए थम गयीं. ‘दीनबंधु’ ने उनकी मृत्यु की खबर को बड़े ही दुख के साथ प्रकाशित किया. जो लोग पीठ पर अपने पुत्र को बाँधकर दुश्मन से लडती हुई लक्ष्मीबाई की बहादुरी का गुणगान करते हैं, उन्होंने इस महिला की बहादुरी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है जिसने अपनी पीठ पर लादकर कर एक बीमार बच्चे को बचाया.

1848 से लेकर 1897 तक, पचास वर्षों के इस काल में सावित्रीबाई ने लोगों के लिए अथक कार्य किया. उन्होंने सेवा और करुणा का एक असाधारण उदाहारण स्थापित किया.

उनकी मृत्यु के बाद डॉ यशवंत अकेले पड़ गए. 1903 में उन्होंने चंद्रभागा से शादी कर ली और उनके एक पुत्री पैदा हुई जिसका नाम उन्होंने सोनी alias लक्ष्मी रखा. डॉ यशवंत भी 1906 में गुजर गए. अब उनकी पत्नी बचीं. ऐसे में, अकेलेपन और अनाथपन की भावना उन पर हावी होती गयी. पहले तो उन्होंने ज्योतिबा फुले के पुस्तकालय को एक कबाड़ी के हाथ बेच दिया फिर बर्तनों को और अंत में घर को ही औने-पौने दामों पर बेच दिया. फुले दम्पति की पुत्रबधू अब बेघर होचुकी थीं. आखिरकर 1930 में लम्बे समय तक अभावों की जिन्दगी जीते हुए रामेश्वर मंदिर में उनकी भी मृत्यु होगई. चंद्रभागा का अंतिम संस्कार नगरपालिका द्वारा किया गया. बाद में उनकी पुत्री की शादी बाबुरावगंगाराम होले से होगई. सोनी उर्फ़ लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया. लक्ष्मीबाई की मृत्यु 1938 में हुई. उनके पुत्र दत्तात्रेय बाबुराव होले इस समय दत्तावाड़ी, पुणे में रहते हैं और पुत्री मुन्धवा में रहती थीं.

इस प्रकार एक क्रांतिकारी परिवार को ह्रदयविदारक अभावों और विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. बिडम्बना देखिये कि जिस फुले दम्पति ने सैकड़ों विधवाओं के जीवन में चिराग जलाया, उन्ही की विधवा पुत्रबधू अभावग्रस्त होकर मंदिर की सीडियों पर मृत्यु पायी. ज्योतिबा फुले लकवाग्रस्त होकर इलाज के अभाव में ही चल बसे थे. सावित्रीबाई लोगों को प्लेग से मुक्ति दिलाते हुए स्वयं ही मुक्ति पागयीं. उनके पुत्र यशवंत भी लोगों की सेवा करते हुए गुजर गए. इस ट्रेजडी(दुखांत) के बारे में कोई क्या कह सकता है? इस असीम बलिदान का कोई कैसे वर्णन कर सकता है?

सावित्रीबाई ने कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण लेखन कार्य भी किया है. उनका साहित्यिक योगदान निम्नवत है——-

काव्यफुले – कविता संग्रह, 1854

ज्योतिराव के भाषण – सावित्रीबाई फुले द्वारा सम्पादित.

सावित्रीबाई के ज्योतिराव को लिखे गए पत्र.

मातोश्री सावित्रीबाई के भाषण, 1892

बावनकाशी सुबोध रत्नाकर, 1892…

यह सम्पूर्ण लेखन डॉ M. G Mali द्वारा संपादित ‘सावित्रीबाई फुले समग्र वांग्मय’ में संकलित किया गया है.

1854 में प्रकाशित ‘काव्यफुले’ सावित्रीबाई फुले की कविताओं का पहला संग्रह है. इसमें कुल 41 कवितायेँ संकलित हैं. प्रकृति और सामाजिक समस्याएं इन कविताओं का विषय हैं. कुछ कवितायेँ उपदेशात्मक भी हैं और कुछ ऐतिहासिक कवितायेँ भी हैं.

‘मातोश्री के भाषण’ में सावित्रीबाई द्वारा विभिन्न विषयों जैसे उद्यम, शिक्षा, सदाचरण, व्यसन और कर्ज इत्यादि पर दिए गए भाषण संकलित हैं.

‘बावनकाशी सुबोध रत्नाकर’ कविताओं का संग्रह है. ये कवितायेँ भारत के इतिहास और ज्योतिबा फुले के गद्यलेखन को काव्य की भाषा में वर्णित करती हैं. इस संग्रह में 52 रचनाएं हैं. ये कवितायेँ 1891 में ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद लिखी गयीं हैं.

सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा फुले को जीवन भर जो सहयोग, सहारा और साहचर्य प्रदान किया, वह असाधारण और अतुलनीय है. स्त्री-पुरुष के बीच समानता और शांतिपूर्ण साहचर्य का जो आदर्श उन्होंने स्थापित किया, वह देश-काल से परे है. शिक्षा, सामाजिक न्याय, और पुरोहिती के उन्मूलन के क्षेत्र में जो कार्य उन्होंने किया, वो केवल हमारे अतीत को ही नहीं अपितु वर्तमान को भी रौशन कर रहा है. यह ऐसा योगदान है जिसका वर्तमान में कोई जोड़ नहीं है. माता सावित्रीबाई की यह विरासत हमारे जीवन को हमेशा के लिए समृद्ध करती रहेगी.

माता सावित्रीबाई फुले की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद.

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ,

बनो परिश्रमी और स्वनिर्भर

काम करो और धन कमाओ,

बुद्धि का तुम करो विकास

ज्ञान बिना सब कुछ खो जावे,

बुद्धि बिना हम पशु हो जावें

अपना वक्त न करो बर्बाद

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ.

विवश और उत्पीडित हैं जो

उनकी पीड़ा तुम दूर करो.

सीखने का है ये सुअवसर

धर्मशास्त्रों को दो त्याग!

जाओ, तोड़ो जाति की बेड़ी

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ

पाओ ज्ञान

शिक्षा न हो, ज्ञान न हो यदि

पाने की भी चाह न हो,

बुद्धि यदि हो पास आपके

पर पड़ी हुई बेकार हो,

खुद को मानव कहलाओगे कैसे

तुम मुझको ये बतलाओ?

पशु-पक्षी, बन्दर और मानव

जीते हैं सब मरते हैं

पर इस अटल सत्य का तुमने

पाया यदि कुछ ज्ञान न हो,

खुद को मानव कहलाओगे कैसे

तुम मुझको ये बतलाओ?

 

 

अंग्रेजी सीखो

खुद के पांव खड़े हो जाओ

ज्ञान ही धन है, इसे कमाओ

ज्ञान बिना पशु होते गूंगे

तुम न रुको! बस शिक्षा पाओ.

ये मौका है, सुनो शूद्रों!

सब कष्टों से मुक्ति के लिए

अब तो तुम अंग्रेजी सीखो

अंग्रेजी को सीखकर,

मत मानो ब्राह्मण की बात,

अंग्रेजी को सीखकर

जाति का बंधन तोड़ दो.

माता सावित्रीबाई फुले, 1854 में प्रकाशित ‘काव्यफुले’ मे संकलित